Wednesday, January 13, 2010

वे जो सदा पीछे ही रहे!

कुछ दिन पहले मैंने अपने बेकार समय को और बेकार बनाते हुएअपने बीते जीवन की विवेचना की। आमतौर पर मैं दूसरों के जीवन और व्यवहार की ही विवेचना और आलोचना करता हूँ। परन्तु कभी कभी दूसरों के बारे में जब यह ज्ञात होता है की वे हमसे जीवन में काफी आगे निकल गए हैं तब मैं स्वयं के जीवन का विश्लेषण करने को बाध्य हो जाता हूँ। इस बार एक मित्र के विषय में जब हमें ज्ञात हुआ की वे १ लाख रूपया महीना कमा रहे हैं तो मैं विचलित हो उठा और आनन् फानन अपने भूतकाल में अपने 'पीछे रह जाने ' के कारक ढूँढने लगा।

जहाँ तक मुझे याद है आठवी कक्षा तक मैं किसी से कभी पीछे नहीं रहा। मैं सदा अपने में मस्त रहता था। स्वयं ही पढाई और खेल के बीच समय का बंटवारा करता थाऔर परीक्षा में भी जो अंक आते थे उन्हें अपने ही मन की गहराईयों में रखकर मगन रहता था। यह पीछे रहने का क्रम प्रारम्भ हुआ नवी से जब हम क्लास में सेकंड थे अर्थात फर्स्ट जो कन्या आई थी उसके पीछे। फिर दसवी आई जहाँ हम अपनी क्लास में तो फर्स्ट हो गये पर अब हम दूसरे सेक्शन के योद्धाओं से पीछे रह गए। ग्यारहवी और बारहवी में हमने अपना लोहा आम जनता को मनवा ही दिया था की एक अलग चुनौती आ गयी। एक अन्य वर्ग बालकों का IIT JEE और PET की तईयारी में हमें पीछे छोड़ चूका था। जो किताब हम लाते थे वे बालक या तो उसे पढ़ चुके होते थे या कूड़े में फेकने की सलाह दे डालते थे। तो यह सिलसिला चलता ही रहा जहाँ कोई न कोई किसी न किसी दिशा में और विषय में हमें पीछे छोड़ता गया। इंजीनियरिंग कालेज में हम दारु पीने, अय्याशी करने, लड़ाई करने, लटके हुए पेपर बार बार देने, लड़की पटाने , और बाद में प्लेसमेंट्स में सबसे पहले नौकरी पाने की रेस में, सभी में पीछे रहे। हमारी पहली नौकरी में हम onsite जाने वालों से पीछे रहे क्योंकि दिन रात प्रार्थना करने के बाद भी नहीं जा पा रहे थे। फिर हमने विचार किया की क्यों न पढाई करके हम आगे निकलने का प्रयास करें। MBA करने का मन बनाया तो IIM जाने वालों से पीछे रह गए। B-School में extra curriculars में शान से पीछे रहते हुए एक तगड़ा salary package पाने की होड़ में भी अधिकाँश batch से पीछे रह गए। अब आज की बात करें तो साहब आज भी शादी करने, १ लाख रुपया महीना कमाने, १ घर खरीद लेने, और कार होने के क्षेत्र में हम बहुत से मित्रों से काफी पीछे रह गए दीख पड़ते हैं।

एक और बात जो मुझे विचलित कर देती है की हमें कभी ऐसे किसी काम से नहीं जोड़ा गया जहाँ हमने, जितना हमसे अपेक्षित था, उससे अधिक कर दिखाया हो। जहाँ जब जब जिसने भी जो भी हमसे अपेक्षा की, हमने हर बार उससे कम ही कुछ करके दिखाया। हमारे बारे में कभी यह नहीं कहा सुना गया की " अरे पता है ...वोह दुबे ने तो...IIT JEE crack कर दी" ,या फिर की "CAT crack कर दी", "अरे उसके तो BLACKI से काल्स हैं", "उसने GRE/GMAT में कमाल कर दिया", या फिर की " अबे यार उसने 20 लाख की जॉब पा ली जबकि बाकी सभी सिर्फ 8 लाख की जॉब निकाल पाए। बल्कि हमारे बारे में सदा यही कहा गया की "हाँ exam तो दिया था पर बिगड़ गया, जॉब तो लगी पर बहुत तगड़ी नहीं लग पाई, CAT दिया था पर IIM नहीं जा पाए, स्मार्ट है पर onsite नहीं जा पाया, काम अच्छा तो करता है पर promote नहीं हुआ " आदि इत्यादि। तो मुझे ऐसा प्रतीत होता है की लोगों को निराश करने में शायद हम सबसे आगे रहे हैं। पर नियति को यह भी शायद स्वीकार्य नहीं क्योंकि मैं ऐसे कुछ व्यक्तियों से भी मिल चूका हूँ जिन्होने इस "लोगों को लगातार निराश करने" के खेल में भी हमें पीछे छोड़ा है ।

मुझे विश्वास है की आगामी वर्षों में लोग हमें हमारे पीछे रहने के लिए याद करेंगे और कहेंगे " वे जो सदा कईओं से कई विषयों में एवं क्षेत्रों में सफलता पूर्वक पीछे रहे, उन्हें हमारा शत शत नमन है, क्योंकि ये नहीं होते तो कितने ही मनुष्य जीवन में आगे होने का सुख नहीं भोग पाते"।

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